Sunday, August 15, 2010

एक शाम

एक शाम
जब बैल आते हैं
हल से खुलने के बाद
नाद पर
हर पहचानी शाम की तरह
और शहर का बाबू
अपने उदास कमरे मे।

एक शाम
जब डाइनिंग टेबल पर
होती हैं बहसें
जनमत और जनतंत्र पर।

एक शाम
जब आंगन में पड़ा मिट्टी का चूल्हा
उदास रोता है
और
एक शाम आती है
वीरान गांवों में
आतंक और चुप्पी के साथ। (रचना: 29.10.91)

प्रकाशन:समकालीन कविता, अक्तूबर-दिसंबर: 2003

No comments:

Post a Comment