Friday, August 27, 2010

सुबह का सूरज

लाल गुलाबी सूरज
चिपका है जो बादलों से अभी
आग का गोला है
अथवा बिन्दी माथे की
उड़ा दी है जिसे हवा में
शैतानी हरकतों ने
किसी क्रूर पति की
उठेगी अभी मां कोई
सुगाहिन टांक लेगी माथे से
बचाकर दुनिया की तेज नजरें
कि वह लाल बड़ी गेंद है
चपल बालिका की
रूठ गई है जो मनमानी से उसकी
टंग गई है जाकर दूर
छोटे पड़ते हैं जहां
नन्हे कोमल हाथ।

अरे! अब तो निराश हो
लौट चली है बालिका
घर को
भांप उसकी पीड़ा
गतिमान हो लिया है सूरज
बच्ची की तेज थिरकती टांगों से
बिठाकर मेल
सरकती है आकाशीय गेंद
खुश है लड़की
मन ही मन
कि गिरेगी अब सीधे
गोल आंगन में उसके
चूम लेगी जी भर
रख देगी सुरक्षित
टूटी टिन की पेटियों में
हंसती पड़ी है जहां
बचपन की रंगीन गुड़िया
बालों से जिसके
आती है रह-रह
केसर-सी खुशबू।
(25.12.96)                    

3 comments:

  1. अद्भुत कल्पना ....सुन्दर अभिव्यक्ति

    कमेंट्स की सेटिंग से वर्ड वेरिफिकेशन हटा लें ..टिप्पणी करने वालों को आसानी होगी

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  2. वाह! बहुत गहरी रचना...

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